उत्तरकाशी। उत्तरकाशी की ऐतिहासिक श्री आदर्श रामलीला समिति की रामलीला के 75वें वर्ष को अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। वर्ष 1952 से निरंतर आयोजित हो रही इस रामलीला में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े पौराणिक प्रसंगों का सजीव मंचन किया जा रहा है। रामलीला मैदान में आयोजित कार्यक्रम में राम-सीता विवाह, जनकपुर से माता सीता की विदाई, भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी तथा कैकेयी-मंथरा संवाद का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों की प्रभावशाली प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
भगवान श्री काशी विश्वनाथ, मां आदिशक्ति दुर्गा भवानी और मां भागीरथी की कृपा तथा धर्मप्रेमी नागरिकों के सहयोग से आयोजित यह रामलीला उत्तरकाशी की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समिति की ओर से पांच अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम 7:30 बजे रामलीला का मंचन किया जा रहा है। 21 अक्टूबर को भगवान श्रीराम की भव्य झांकी और पुरस्कार वितरण के साथ आयोजन का समापन होगा।
रामलीला में प्रस्तुत राम-सीता विवाह का प्रसंग रामचरितमानस के बालकांड में वर्णित सीता स्वयंवर की कथा पर आधारित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, मिथिला के राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए भगवान शिव के दिव्य धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त रखी थी। अनेक राजाओं के असफल रहने के बाद महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान श्रीराम ने धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। इसके बाद माता सीता ने श्रीराम को वरमाला पहनाई। विवाह प्रसंग के मंचन में भारतीय परंपराओं, पारिवारिक संस्कारों और धार्मिक आस्था की सुंदर झलक देखने को मिली।
इसके बाद जनकपुर से माता सीता की विदाई का दृश्य प्रस्तुत किया गया। पुत्री की विदाई के समय राजा जनक और रानी सुनैना की भावनाओं को कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से मंच पर उतारा। इस दृश्य ने दर्शकों को भावुक कर दिया। रामकथा का यह प्रसंग माता-पिता के स्नेह, पारिवारिक संबंधों और जीवन में संस्कारों के महत्व को रेखांकित करता है।
रामलीला के अगले प्रसंग में अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों और कैकेयी-मंथरा संवाद का मंचन हुआ। रामचरितमानस के अयोध्याकांड के अनुसार, मंथरा के बहकावे में आकर कैकेयी राजा दशरथ से अपने दो पूर्व निर्धारित वरदान मांगती हैं। इनमें भरत के लिए राजगद्दी और भगवान श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास शामिल था। इस घटनाक्रम ने रामकथा को निर्णायक मोड़ दिया। राजा दशरथ की विवशता और श्रीराम के वचनपालन की भावना को कलाकारों ने प्रभावी अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया।
रामलीला के इन प्रसंगों में धर्म, मर्यादा, त्याग और कर्तव्यपालन का संदेश प्रमुखता से उभरकर सामने आया। भगवान श्रीराम का जीवन सत्य और आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है। पिता के वचन की रक्षा के लिए वनवास स्वीकार करना उनके मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को दर्शाता है। रामलीला के माध्यम से इन आदर्शों को समाज और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सात दशक से अधिक समय से निरंतर आयोजित हो रही यह रामलीला स्थानीय लोक संस्कृति और सामूहिक सहभागिता की सशक्त परंपरा का उदाहरण है।
मंचन में राजा दशरथ की भूमिका विजय चौहान, कौशल्या की निकिता, सुमित्रा की इशिका, कैकेयी की रचना रावत, राजा जनक की सुभाष राणा और सुनैना की भूमिका राजकुमारी राणा ने निभाई। भगवान श्रीराम के रूप में आयुष पंवार, माता सीता के रूप में हेमंती रावत, लक्ष्मण के रूप में गोपाल राणा और महर्षि विश्वामित्र के रूप में ध्रुव नौटियाल ने अभिनय किया। सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों की सराहना प्राप्त की।
कार्यक्रम में उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध शल्य चिकित्सक डॉ. सुरेंद्र दत्त सकलानी और उनकी धर्मपत्नी डॉ. शशि सकलानी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। जिला कृषि अधिकारी और विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता भी कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष डॉ. जयेंद्र सिंह पंवार, प्रबंधक भूपेश कुड़ियाल, महासचिव शांति प्रसाद भट्ट, कोषाध्यक्ष अरविंद सिंह राणा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष रमेश चौहान, निर्देशक महेंद्र सिंह पंवार एवं चंद्रमोहन सिंह पंवार, संयोजक खुशहाल सिंह चौहान एवं विजय चौहान, मंच निर्देशक केसर सिंह सजवाण एवं प्रवीण कैन्तुरा सहित समिति के पदाधिकारी, कलाकार और सहयोगी मौजूद रहे।
समिति के प्रबंधक भूपेश कुड़ियाल ने बताया कि रामलीला के 75वें वर्ष को अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। आयोजन का उद्देश्य भगवान श्रीराम के आदर्शों, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाना है। 21 अक्टूबर को भगवान श्रीराम की झांकी और पुरस्कार वितरण के साथ इस वर्ष की रामलीला का समापन किया जाएगा।





