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उत्तराखंड में धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम पर बड़ा बदलाव, अब शिक्षा परिषद की मंजूरी जरूरी नहीं

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Vijaya Dimri
Vijaya Dimrihttps://bit.ly/vijayadimri
Editor in Chief of Uttarakhand's popular Hindi news website "Voice of Devbhoomi" (voiceofdevbhoomi.com). Contact voiceofdevbhoomi@gmail.com

देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। अब राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम लागू करने से पहले उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन लेने की जरूरत नहीं होगी। विधानसभा सत्र के पहले दिन सरकार ने अन्य विधेयकों के साथ उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम संशोधन विधेयक सदन में पेश किया।

संशोधन विधेयक में अधिनियम की धारा 12 की उपधारा तीन से ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद के अनुमोदन से’ शब्द हटाने का प्रस्ताव है। वर्ष 2025 में बनाए गए उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम के तहत राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में संशोधन और उसे लागू करने का काम विद्यालयी शिक्षा परिषद की मंजूरी के बाद ही कर सकता था।

प्रस्तावित संशोधन के बाद धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करने और उसे लागू करने का अधिकार प्राधिकरण के स्तर पर ही रहेगा। इसका असर मदरसों समेत अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में लागू होने वाले धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम पर पड़ेगा।

दरअसल, राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने विभिन्न धर्म गुरुओं और जानकारों के साथ विचार-विमर्श और उनकी सहमति के बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार किया है। हालांकि, विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन की प्रक्रिया के चलते इसे लागू करने में अड़चन आ रही थी। अब सरकार ने इसी बाध्यता को समाप्त करने के लिए अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव रखा है।

कार्रवाई से पहले संस्थानों को मिलेगा सुनवाई का मौका

संशोधन विधेयक में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े प्रावधान को भी स्पष्ट किया गया है। अधिनियम की धारा तीन की उपधारा एक के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किसी संस्थान में धार्मिक शिक्षा दिए जाने पर प्राधिकरण दंडात्मक कार्रवाई या अर्थदंड लगाने से पहले संस्थान संचालक को सुनवाई का अवसर देगा।

इसका मतलब है कि प्राधिकरण सीधे दंड या जुर्माना लगाने के बजाय पहले संबंधित संस्थान का पक्ष सुनेगा। इसके बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि संशोधन विधेयक में धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के लिए विद्यालयी शिक्षा परिषद से अनुमोदन लेने की बाध्यता समाप्त करने का प्रावधान किया गया है।

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