उत्तरकाशी। उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने के बाद भी जनपद मुख्यालय का सबसे प्रमुख सार्वजनिक स्थल रामलीला मैदान (आजाद मैदान) बदहाल स्थिति से जूझ रहा है। कभी उत्तरकाशी की सांस्कृतिक, सामाजिक और खेल गतिविधियों का केंद्र माना जाने वाला यह मैदान आज अव्यवस्था, अतिक्रमण और बहुउद्देशीय उपयोग के दबाव के बीच अपनी पहचान बचाने की चुनौती का सामना कर रहा है।
शहर के मध्य स्थित रामलीला मैदान को लंबे समय से “हार्ट ऑफ द सिटी” के रूप में जाना जाता रहा है। वर्षों तक यहां रामलीला मंचन, बाड़ाहाट थौलू मेला, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोह, फुटबॉल एवं क्रिकेट प्रतियोगिताएं, जनसभाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा विभिन्न सार्वजनिक आयोजन होते रहे हैं। यही कारण है कि यह मैदान केवल एक खुला परिसर नहीं, बल्कि उत्तरकाशी की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्तमान में मैदान का स्वरूप लगातार बदलता जा रहा है। यात्राकाल के दौरान पार्किंग व्यवस्था के लिए उपयोग में लाए जाने वाले इस मैदान में कई स्थानों पर वाहन मरम्मत कार्य, अस्थायी व्यापारिक गतिविधियां, फल एवं सब्जी विक्रेताओं की दुकानें, रेहड़ी-ठेली और अन्य अस्थायी ढांचे दिखाई देते हैं। इससे मैदान की उपयोगिता प्रभावित हो रही है और खेल गतिविधियों के लिए उपलब्ध खुला क्षेत्र लगातार कम होता जा रहा है।
सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने सवाल उठाया है कि मैदान के रखरखाव और प्रबंधन की जिम्मेदारी किस विभाग के पास है। जिला पंचायत, नगरपालिका और जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। लोगों का कहना है कि यदि मैदान को अस्थायी रूप से पार्किंग के लिए उपयोग किया जा रहा है तो उसके मूल स्वरूप और स्वच्छता को बनाए रखने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।
गंगा विचार मंच नमामि गंगे उत्तराखंड के प्रांत संयोजक लोकेंद्र सिंह बिष्ट ने कहा कि उत्तरकाशी के युवाओं के लिए खेल मैदानों की कमी पहले से ही एक बड़ी समस्या है। ऐसे में रामलीला मैदान का संरक्षण और सुव्यवस्थित विकास अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समय-समय पर मैदान के सौंदर्यीकरण और रखरखाव के लिए विभिन्न कार्य किए गए, लेकिन इसके बावजूद मैदान अपनी पुरानी गरिमा और उपयोगिता प्राप्त नहीं कर पाया है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि उत्तरकाशी जैसे पर्वतीय नगर में बड़े सार्वजनिक मैदानों की संख्या सीमित है। ऐसे में रामलीला मैदान का सुनियोजित विकास न केवल खेल गतिविधियों को बढ़ावा देगा, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों के लिए भी बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराएगा।
नागरिकों ने संबंधित विभागों से मैदान की वर्तमान स्थिति का आकलन कर इसके संरक्षण, सौंदर्यीकरण और उपयोग के लिए स्पष्ट नीति बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि उत्तरकाशी की पहचान से जुड़े इस ऐतिहासिक मैदान को उसकी पुरानी गरिमा लौटाने के लिए ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाए जाने चाहिए।





